ग्रामीण परिवेश के उच्च शिक्षण संस्थानों की उपेक्षा

नैक की मान्यता को लेकर बंद हुए संस्थानों में जागरुकता कार्यक्रम
*पहले हर वर्ष सामयिक विषयों पर होते थे सेमिनार
*युवा वर्ग में बढ़ती थी जागरुकता
*अनुभवी लोगों का मिलता था साथ

नालंदा (बिहार) – ग्रामीण परिवेश में स्थापित हरनौत प्रखंड का जीडीएम व आरपीएस कॉलेज ग्रामीण प्रतिभाओं को निखारने का बेहतर मंच है। यहां स्नातक स्तर तक व्यवसायिक व सामान्य विषयों की पढ़ाई होती है। कई डिप्लोमा कोर्स भी संचालित हैं। यहां नालंदा के साथ नवादा व पटना जिला के छात्र भी पढ़ने आते हैं। इसकी एक बड़ी वजह वर्ष भर में सामयिक व ज्वलंत विषयों पर होने वाले दो से तीन सेमिनार भी कहे जा सकते हैं। सेमिनार में देश भर से विद्वान व शिक्षाविद शामिल होते थे। छात्रों को उनके सामने अपनी बातें रखने और उन्हें सुनने का मौका मिलता था। पर, पिछले कुछ वर्षों से इनमें चहल-पहल का सूखा है।
प्रबंधन बताता है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के माध्यम से सेमिनार व अन्य जागरुकता कार्यक्रमों के आयोजन की स्वीकृति मिलती थी। पर, इसे पिछले कुछ वर्षों से बंद कर दिया गया है।
वजह, अब इसकी स्वीकृति के लिए कॉलेज को नैक के मापदंडों को पूरा करना होगा।
हालांकि वर्षों वित्तरहित का दंश झेलने के बाद सरकारी अनुदान से स्थिति थोड़ी बदली है। कॉलेज प्रबंधन के द्वारा यहां वर्गकक्ष के अलावा लाइब्रेरी, कम्प्यूटर लैब, छात्रावास, वाहन पार्किंग की व्यवस्था में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती है। पर, फिर भी वे किसी न किसी बहाने नैक की मान्यता से वंचित कर दिए जाते हैं। कॉलेज सूत्रों की मानें तो इसके पीछे भ्रष्टाचार बड़ी वजह है।
इसका असर यह हुआ है कि अतिरिक्त कार्यकलाप से छात्रों को होने वाले फायदे नजर नहीं आते। कॉलेज परिसर सिर्फ सब्जेक्टिव पढ़ाई का संस्थान बनकर रह गया है।

:: जिले में तीन कॉलेजों को हीं मान्यता

नालंदा जिले के शहरी इलाके में स्थित किसान, नालंदा व पटेल कॉलेज को ही यूजीसी की मान्यता प्राप्त है।
शिक्षाविद सिरसी के रामईतर सिंह, खरथूआ के वाल्मिकी शर्मा कहते हैं कि वर्तमान में शराबबंदी, दहेज प्रथा व बालविवाह उन्मूलन और जल जीवन हरियाली जैसे सरकारी कार्यक्रम चल रहे हैं। अगर उच्च शिक्षण संस्थान के माध्यम से इनको बढ़ावा मिलता तो लोग खासकर युवा वर्ग ज्यादा जागरुक होते।
पर, शिक्षा पर सरकार और विभाग की वर्तमान कार्यशैली उसकी नीयत पर शक पैदा करती है।

रिपोर्ट – गौरी शंकर प्रसाद

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