बरसात में दूधारू पशुओं की सही देखभाल जरुरी

* बाह्य परजीवी के चलते दूध उत्पादन पर असर

नालन्दा(हरनौत) – कृषि विज्ञान केंद्र के पशु चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ संजीव रंजन ने पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।
डॉ रंजन ने कहा कि मानसून का आगमन हो चुका है। खेतों में काफी हरा चारा है। ऐसे में किसान उन्हें भरपेट हरा चारा खिलाते हैं। यह दूध उत्पादन लेने का सस्ता तरीका भी है। पर इसके बाद पशुओं के गोबर पतला करने की शिकायत भी मिलती है।
पशुओं के पेट में कीड़े होने पर गोबर पतला और बदबूदार होता है। उन्हें गंदा पानी पिलाने से भी बैक्टीरियल या प्रोटोजोअल इंफेक्शन से गोबर पतला होता है।
चारे में नमी की मात्रा अधिक होने से भी गोबर पतला होता है।
अगर गोबर में कीड़ा या अंडा नहीं दिखता हो। उससे बदबू नहीं आ रही हो तो समझें कि पशुओं को दिये जा रहे हरे चारे में पानी की मात्रा अधिक है। ऐसी स्थिति में हरे चारे की मात्रा घटाकर सूखे चारे की मात्रा बढ़ानी चाहिए। गोबर में बदबू होने पर आवश्यक दवा देनी चाहिए।
इस मौसम में बाह्य परजीवी या किलनी की समस्या भी बढ़ जाती है। यह पशुओं को काटती और खून चूसती है। पशु बेचैन रहते हैं। दूध उत्पादन भी घट जाता है। किलनियों से कई रक्त प्रोटोजोआ जनित बीमारी होती हैं। इसलिए इनका नियंत्रण जरुरी है।
डॉ रंजन ने कीटनाशक दवा अमितराज की दो मिली मात्रा एक लीटर पानी में घोल बनाकर पशु के शरीर पर सप्ताह में एक बार तीन सप्ताह तक लगानी चाहिए। दवा के उपयोग के समय पशु के मुंह, नाक और आंख को बचाकर साथ ही अपने हाथ में दस्ताने पहन लें। पशुओं को बांधने की जगह में तीन लीटर पानी में छह मिली दवा का घोल बनाकर दवा का छिड़काव करना चाहिए। साथ ही वहां दरार या छिद्र हो तो उसे सीमेंट आदि से भर देना चाहिए। वहीं किलनियों के बच्चे व अंडे होते हैं।

रिपोर्ट – गौरी शंकर प्रसाद

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